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किसानों को सुरक्षा नहीं देते हैं कृषि कानून : RLSP

पटना : राष्ट्रीय लोक समता पार्टी ने केंद्र सरकार के कृषि कानूनों के खिलाफ हल्ला बोलना जारी रखा है. राज्यव्यापी किसान चौपाल के ग्यारहवें दिन रालोसपा नेताओं ने किसानों से कहा कि ये कानून किसानों को सुरक्ष नहीं देते हैं. रालोसपा नेताओं ने इन कृषि कानूनों के काले पक्ष को किसानों के सामन रखते हुए कहा कि एपीएमसी एक्ट का प्रावधान 18 और 19, कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग एक्ट में दिक्कतें हैं जो किसानों को किसी भी तरह की सुरक्षा नहीं देते हैं. भारत के संविधान का आर्टिकल 19 देश के लोगों को अपनी आवाज उठाने का अधिकार देता है. लेकिन कृषि कानून के ये एक्ट किसी भी तरह की कानूनी चुनौती देने से रोकते हैं. इसमें सिर्फ ये नहीं कि किसान नहीं कर सकते, बल्कि कोई भी चुनौती नहीं दे पाएगा. इन प्रावधानों के मुताबिक अगर किसान और कंपनी में कोई विवाद होता है तो उसे 30 दिन में निपटाना होगा. ऐसा ना होने पर कानूनी रास्ता अपनाना होगा. इसमें भी किसान सीधे सिविल कोर्ट नहीं जा पाएगा, बल्कि ट्रिब्यूनल के सामने अपील करनी होगी. रालोसपा नेताओं का कहना है कि अगर किसान हर मसले के लिए ऐसे चक्कर काटता रहेगा, तो उससे फायदा नहीं नुकसान होगा. पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव व प्रवक्ता फ़ज़ल इमाम मल्लिक और प्रदेश महासचिव व प्रवक्ता धीरज सिंह कुशवाहा ने यह जानकारी प्रेस कांफ्रेंस में दी. किसान संगठनों और किसानों के आंदोलन के समर्थन में राष्ट्रीय लोक समता पार्टी ने बिहार में किसान चौपाल की शुरुआत दो फरवरी से की है. प्रेस कांफ्रेंस में प्रदेश के कार्यकारी अध्यक्ष संतोष कुशवाहा, प्रधान महासचिव निर्मल कुशवाहा, अभियान समिति के अध्यक्ष जीतेंद्र नाथ, किसान प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष सुभाष कुशवाहा, आईटी प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष रोशन राजा, किसान प्रकोष्ठ के प्रधान महासचिव रामशरण कुशवाहा, प्रदेश महासचिव राजदेव कुशवाहा, भुनेश्वर कुशवाहा, आईटी सेल के प्रदेश उपाध्यक्ष अभिषेक कुमार, कार्यालय प्रभारी अशोक कुशवाहा व राजेश सिंह भी मौजूद थे.
प्रेस कांफ्रेंस में पार्टी नेताओं ने बताया कि बिहार में किसानों को जागरूक बनाने और देश भर में चल रहे किसान आंदोलन के समर्थन में रालेसपा राज्यव्यापी किसान चौपाल कार्यक्रम चला रही है. अब तक करीब ढाई हजार से ज्यादा गांवों में किसान चौपाल लगाई जा चुकी है.
राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के किसान चौपाल में किसान खुल कर अपनी बात कह रहे हैं. वे न सिर्फ इन कानूनों का विरोध कर रहे हैं बल्कि सरकार के उस प्रस्ताव को भी ठीक नहीं मान रहे हैं जो सरकार ने किसानों के सामने रखा था. सरकार ने कृषि कानूनों को देढ़ साल तक स्थगित करने का प्रस्ताव किसान संगठनों को दिया था, बिहार के किसान इसे सही नहीं मान रहे हैं. किसान सरकार के संशोधन के प्रस्ताव से सहमत नहीं हैं और इसे भ्रमाने वाला मान रहे हैं. मल्लिक ने बताया कि बिहार के किसान ने न्यूतम समर्थन मूल्य पर कानून बनाए जाने के पक्ष में हैं, उनका मानना है कि इससे बिहार के किसान को फायदा होगा.
किसान चौपाल की जानकारी देते हुए पार्टी नेताओं ने कहा कि किसान चौपाल के जरिए पार्टी किसानों को इन कानूनों के सच उजागर करने में कामयाब हो रही है. मल्लिक और धीरज ने बताया कि इन कृषि कानूनों में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे किसानों का भला हो. ये कानून अगर पूरी तरह से लागू हो गए तो किसान अपने खेत पर ही मजदूरी करने के लिए मजबूर हो जाएगा. रालोसपा की किसान चौपाल शनिवार को गोपालगंज, बक्सर, नवादा व बक्सर जिलों में लगाई गई. एक हफ्ते में करीब बीस जिलों में चौपाल लगाई जा चुकी है.
रालोसपा इन कानूनों की खामियों की चर्चा पार्टी के कार्यक्रम किसान चौपाल में कर रही है और किसानों व आम लोगों को बता रही है कि तीन कृषि कानून दरअसल किसानों के लिए डेथ वारंट है. इन कानूनों के जरिए केंद्र सरकार किसानों को गुलाम बनाने पर तुली हुई है. पार्टी नेताओं ने बताया कि बिहार में किसान जानना चाह रहे हैं कि इन कानूनों में ऐसा क्या है जिससे देश के किसान आंदोलित है और दिल्ली की सीमा पर आंदोलन चल रहा है. किसान इन कानूनों को लेकर रालोसपा नेताओं से सवाल कर रहे हैं और पार्टी के जिला प्रभारी व दूसरे नेता उनके सवालों का जवाब दे रहे हैं और उन्हें इन कानूनों से होने वाले नुकसान की जानकारी भी दे रहे हैं. पार्टी नेता और कार्यकर्ता गांवों के अलावा शहरों में भी बुद्धीजिवियों और छात्रों के अलावा समाज के वंचित तबके के बीच जाकर इन कानूनों की सच्चाई सामने रख रहे हैं और बता रहे हैं कि यह कानून किसानों को गुलाम बनाने वाला है. इससे किसानों के साथ-साथ समाज के दूसरे तबके का अहित होगा. रालोसपा ने दस हजार गांवों में किसान चौपाल लगाने का लक्ष्य तो रखा ही है इसके अलावा 25 लाख किसानों तक पहुंच कर इन कानूनों की जानकारी और जागरूक बनाने का भी लक्ष्य रखा है.  फ़ज़ल इमाम मल्लिक / धीरज सिंह कुशवाहा

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